**पर तुम्हारी बात और थी**
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वैसे किसी के होने और न होने से उतना फर्क नहीं पड़ता है , पड़ता भी होगा तो वो शायद समय के साथ धूमिल हो जाती होगी | मेरे जीवन में जो लोग आये और गए भी ,मुझे भी न उनके आने और जाने से कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ा , पर तुम्हारी बात और थी |
तुम आई और बस आ गयी , और शायद अब तुम भी जा चुकी हो | अनुभव के हिसाब से तो मुझे कुछ ख़ास नहीं फर्क पड़ना नहीं चाहिए , लेकिन जिस हिसाब से तुम कुंडली मार कर बैठी हुई हो ज़हन में , मुश्किल है ,बहुत मुश्किल है और शायद नामुमकिन | तो किया क्या जा सकता है ?
इंतज़ार तब भी किया था और इंतज़ार अब भी करूँगा और तब तक करूँगा जब तक या तो तुम वापस नहीं आ जाती या तुम धुंधली नहीं हो जाती ज़हन से |
मैं पहले विकल्प के लिए ज्यादा आशावादी हूँ , दुसरे विकल्प के बारे में सोचना मात्र ही सिहरन मचा देती है दिलो दिमाग में |
वैसे मेरा कोई अधिकार तो नहीं है तुमपर क्यूंकि मैं तो प्रेम करता हूँ तुमसे , इसलिए तुमको जबरदस्ती खींच कर नहीं ला सकता , फिर भी देख लेना | हो सकता है हैडफ़ोन में वही गान बज रहा हो तुम्हारे भी , जो दो दिन पहले हम गुनगुना रहे थे और कुछ बात बन जाये और ऐसी बात बन जाये की फिर दूबारा न बिगड़े |
शायद तुमको याद हो न हो , पर तुम्हारी एक मुस्कराहट काफी होती थीे
Mayank