03 January, 2019

पढ़ने के उम्र में अपराध में बच्चों किशोरों का शामिल होना भारतीय समाज के लिए खतरा

आज जब बच्चो को आपराधिक किश्म के लोगो से ज्यादा तालमेल देखता हूँ तो बहुत दुःख होता है।
खास कर सहरसा जैसे धरती जहां मण्डन मिश्र,बाबा लक्ष्मी नाथ जैसे महान दार्शनिक विद्वान जैसे लोगो ने जन्म लिया तो सोचने पर मजबुर हो जाता हूँ कि आखिर हमारे सहरसा या यहां के युवाओं में इतना आपराधिक शक्ति क्यों पनप रहा है।क्या है इसका कारण।क्यों लगातार किसी छोटे मोटे बातों पर किसी का जान ही ले लिया जाता हैं।क्यों हमरा समाज मे ऐसे बच्चें पनप रहा है वजह क्या है।क्यों अच्छे अच्छे परिवार से संस्कार प्राप्त बच्चे किसी का हत्या कर देता है।क्यों उसको आपराधिक किस्म के लोग ज्यादा भाते हैं।
भारत में किशोरों द्वारा अपराध एक कड़वी वास्तविकता है। वर्तमान समय में किशोर बहुत से खतरनाक अपराधों में शामिल पाये जाते हैं जैसे: हत्या, सामूहिक दुष्कर्म आदि। ये एक चिन्ता का विषय है और पूरा समाज बच्चों द्वारा किये जाने वाले इस तरह के अपराधिक कृत्यों से दुखी है। बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान कानून स्थिति को नियंत्रित करने के लिये अपर्याप्त है और हमें इसमें बदलाव लाने की जरुरत है ताकि खतरनाक अपराधों के लिये किशोरों को भी वयस्कों की तरह दंडित किया जाये। लेकिन इसके साथ ही बहुत से लोग इसके विरोध में भी हैं जो इस विचार को नही मानते हैं।

सहरसा में लगातार हो रहें अपराध में किशोर का शामिल होना लगातार बढ़ रहा है।
सहरसा रेलवे स्टेशन से घर जा रहे बड़हसेर निवासी बीबीए पैनल के राज्यस्तरीय अंपायर के साथ लूटपाट के बाद उसे चाकू मारकर गंभीर रूप से घायल कर दिया।

नए साल 2019 के दूसरे दिन ही आज दिनदहाड़े सदर थाना के लक्ष्मीनियाँ चौक स्थित होम्योपैथी कॉलेज के समीप लॉज में रह रहे प्रिंस यादव नाम के एक किशोर को तीन अपराधियों ने लॉज में घुसकर गोली मार दी। अपराधियों ने गोली प्रिंस के सीने में मारी और वहां से उड़न छू हो गए


बच्चों को भगवान का रुप मता है और महान व्यक्ति के साथ ही राष्ट्रीय सम्पत्ति भी माना जाता है। वैयक्तिक रुप से, माता-पिता, अभिभावक और पूरे समाज के रुप में हमारा एक नैतिक कर्तव्य है कि हम बच्चों के लिये स्वस्थ्य सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण में बड़ा होने की अनुमति और अवसर प्रदान करें ताकि वो जिम्मेदार नागरिक, शारीरिक रुप से तंदरुस्त, मानसिक सतर्क और नैतिक रुप से स्वस्थ्य बन सकें। ये राज्य का कर्त्तव्य है कि वो सभी बच्चों को उनकी बढ़ती हुई आयु की समयावधि पर विकास के लिये समान अवसर प्रदान करे जो असमानता को कम करके और सामाजिक न्याय को सुनिश्चित कर सके। बच्चों से आज्ञाकारी, बड़ों का आदर करने वाला और अपने अंदर अच्छे गुणों को धारण करने वाले होने की अपेक्षा की। जाती है। हालांकि, बहुत से कारणों के कारण बच्चों का एक निश्चित प्रतिशत पहले से कही हुईसामाजिक और वैध उक्तियों को नही अपराधिक गतिविधियों में शामिल हो जाते में जाना जाता है।


एक प्रमुख न्यूज़ वेबसाइट लिखता है।

सहरसा बना अपराधियों का हब और जंक्शन, पुलिस के छूट रहे हैं पसीने

आये दिन अपराधिक मामलों में पकड़े जाने वाले नाबालिगों की संख्या में  इजाफा हो रहा है. ऐसा कोई जुर्म नहीं है, जिसमें नाबालिग शामिल न हों. मोबाइल चोरी व छिनतई से लेकर बलात्कार और हत्या जैसे संगीन मामलों में भी नाबालिगों की बढ़ती तादाद सिर्फ कानूनी एजेंसियों के लिए नहीं, बल्कि हम सभी के लिए चिंताजनक है. पिछले पांच वर्षों के आंकड़े लोगों के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं. अक्सर ऐसी सूचना मिलती रहती है कि अमूक बच्चे या किशोर ने किसी की हत्या कर दी अथवा किसी अपराध की घटना को अंजाम देते हुए पकड़ा गया. नाबालिगों का आपराधिक घटनाओं में संलिप्त होना बेहद गंभीर मसला है. पारिवारिक व सामाजिक बदलाव का असर बच्चे के नाजुक दिलों-दिमाग पर भी हो रहा है. परिवार में उचित देखभाल की कमी एवं नैतिक शिक्षा नहीं मिलने से बच्चे अपराध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं. नाबालिगों में आक्रामकता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है. यही कारण है कि अभिभावकों, मनोवैज्ञानिकों व समाजशास्त्रियों के लिए यह मुद्दा चिंता का विषय बन गया है. बाल अपराधियों की संख्या में जबर्दस्त वृद्धि के आंकड़े किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं हैं. जिनके कंधों पर देश की बागडोर टिकी है, उनका अापराधिक वारदात में संलिप्त होना एक गंभीर मामला है. ऐसे में अभिभावकों व परिजनों की जिम्मेवारी बढ़ जाती है. बच्चों के रहन-सहन एवं उनके मित्रों के संबंध में जरूरी जानकारी रखना जरूरी है
प्रभात खबर के अनुसार।
आंकड़ों में बाल अपराध वर्ष - घटनाएं  2010 - 89 2011 - 121 2012 - 114 2013 - 183 2014 - 265 2015 - 240 2016 - 413 2017 - 251 (25 जुलाई 2017 तक)


किशोरों के भटकने के हैं कई कारण : 

किशोरों के आपराधिक कांडों में शामिल होने के कई कारण हैं. इसमें फिल्में व टेलीविजन की भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती है. कई प्रकार के कार्यक्रमों में जिस तरह से अपराध और हिंसा करने वालों को नायक के रूप में दिखाया जाता है, उसका बच्चों व किशोरों के दिमाग पर बुरा असर होता है. अपरिपक्व बुद्धि के चलते बच्चे फिल्मों के हीरो या विलेन को अपना रोल मॉडल बना लेते हैं, उपभोक्तावादी संस्कृति भी इसका एक पहलू है. शार्टकट में पैसा कमाने की लालसा इस समस्या का प्रमुख कारण है. आज चमक-दमक सभी नैतिक मूल्यों पर हावी हो रहा है. इसके कारण बच्चों में हर वस्तु को पाने की लालसा बढ़ गयी है. बच्चों की मांगें जब पूरी नहीं होती हैं, तो मासूम बच्चे गुमराह होकर अपराध की ओर अग्रसर हो जाते हैं. अाक्रामक प्रवृत्ति व अपराध के लिए कुछ हद तक हार्मोन भी उत्तरदायी है. बच्चों का शारीरिक विकास समय से पूर्व से हो रहा है. इस कारण बच्चों में हार्मोन की सक्रियता अतीत के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ गयी है. नि›त अनुपात से हार्मोन के अधिक सक्रिय से आक्रामक प्रवृत्ति बच्चों में तेजी से बढ़ रही है. कौन होते हैं बाल अपराधी भारतीय कानून के अनुसार 16 वर्ष की आयु तक के बच्चे अगर ऐसा कोई कृत्य करें, जो समाज या कानून की नजर में अपराध हैं, तो ऐसे लोगों को बाल अपराधी की श्रेणी में रखा जाता है. हमारा कानून यह स्वीकार करता है कि किशोरों द्वारा किये गये अनुचित व्यवहार के लिए किशोर स्वयं नहीं, बल्कि परिस्थितियां उत्तरदायी होती हैं. इसी वजह से देश में किशोर अपराधों के लिए अलग कानून और न्यायालय है. बाल अपराधियों को दंड नहीं दिया जाता, बल्कि उनमें सुधार के लिए उन्हें बाल सुधार गृह में रखा जाता है और उन्हें सुधरने का मौका दिया जाता है.  बाल अपराध वाले कृत्य माता-पिता की अनुमति के बिना घर से भाग जाना, स्कूल से भाग जाना.  अपने पारिवारिक सदस्यों के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करना.  वैसी आदतें, जो न तो बच्चों के हित में है और न ही परिवार के. बाल अपराधों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है. पहले मोबाइल चोरी समेत अन्य हलके-फुलके आपराधिक घटनाओं में किशोरों की संलिप्तता होती थी, मगर वर्तमान में गंभीर किस्म के अपराधों में भी किशोरों की संलिप्तता देखी जा रही है, जो चिंताजनक है. कंधे पर बस्ता व हाथों में कलम लेने की उम्र में किशोर गंभीर किस्म के अपराधों की ओर बढ़ रहे हैं, जो सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं है. 

अभिभावकों को इस संबंध में विशेष ध्यान देने की जरूरत है. किशोरों के रहन-सहन व उनके मित्रों के संबंध में अभिभावकों को पूरी जानकारी रखना जरूरी है. 

किशोर अपराधियो को अपने जुर्म पर कोई पछतावा नही

जब भी अपराधियों को पकड़ा जाता है, तो उनमें बहुत से ऐसा कहते हैं कि उन्हें कोई दुख या पछतावा नहीं. इनमें से बहुतों का कोई आपराधिक रिकाॅर्ड भी नहीं होता. दुख या पछतावे की भावना का न होना हमारे समाज के लिए अच्छा तो नहीं है.

मुरारी कुमार मयंक
murarikrmayank@gmail.com