- प्रणय कृष्ण
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के जुर्म बहुत दिनों से गिने जा रहे थे, सजा अब तजवीज की गई है। 3 नवंबर को होने वाले छात्रसंघ चुनाव पर उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी क्योंकि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों की तामील में अदालत की मदद के लिए वादमित्र के बतौर नियुक्त भारत सरकार के असिस्टेंट सॉलीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने जेएन यू छात्रसंघ चुनावों को न्यायालय की अवमानना माना।
सुब्रमण्यम ने किसी की शिकायत पर नहीं, बल्कि स्वप्रेरणा से इसे संज्ञान में लेते हुए अदालत को सूचना दी। ज्ञातव्य है कि लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों को उच्चतम न्यायालय ने 22 नवंबर 2006 के अपने आदेश में पूरे देश के छात्रसंघ चुनावों के लिए मान्य घोषित किया था। इस तरह यह अनूठा छात्रसंघ जिसे जेएनयू के सारे ही तत्कालीन छात्रों ने बगैर विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोग के, स्वतंत्र रूप से, जबर्दस्त बहस मुबाहिसे के बाद 1971 में कायम किया था, जिसका संविधान भी खुद छात्रों ने बनाया था और जिसका चुनाव भी 1971 से लेकर अब तक छात्र समुदाय एक चुनी हुई चुनाव संचालन समिति के माध्यम से खुद ही संचालित करता आया है, उसके चुनाव पर रोक लगा दी गई।
जेएनयू छात्रसंघ के इस स्वाधीन चरित्र के ही चलते इस पर आपातकाल के दौरान भी रोक नहीं लगाई जा सकी थी जबकि आपातकाल के विरोध का वह महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा।
गोपाल सुब्रमण्यम द्वारा जेएनयू छात्रसंघ चुनाव को लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप नहीं पाया जाना खुद में एक हैरतअंगेज बात है क्योंकि लिंगदोह कमेटी की सीमाएँ जो भी हों, उसने जेएनयू छात्रसंघ के मॉडल की तारीफ ही की है। लिंगदोह कमेटी की न्यायालय द्वारा मंजूर की गई पहली ही सिफारिश यह है कि 'देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को छात्रों की प्रतिनिधि संस्थाओं में नियुक्ति के लिए सामान्यतः चुनाव कराने चाहिए।' देश के अनेक प्रांतों के तमाम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में किसी न किसी बहाने से छात्रसंघ चुनाव कराए ही नहीं जाते। क्या यह उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अवहेलना नहीं है?
क्या गोपाल सुब्रमण्यम इसका भी संज्ञान लेंगे? लिंगदोह कमेटी बैठाने के पीछे छात्रसंघ चुनावों में हिंसा और बेइंतेहा पैसा खर्च किए जाने, जातिगत और साम्प्रदायिक प्रचार, चरित्र हनन वगैरह को रोकने की मंशा बताई जाती रही है। अगर सचमुच यही लिंगदोह कमेटी की मंशा है, तो निस्संदेह वह जेएनयू या हैदराबाद विश्वविद्यालय के चुनावों में ही पूरी होती है, और कहीं भी नहीं, यहाँ तक कि उन जगहों पर भी नहीं, जहाँ लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों के अनुरूप हाल के दिनों में चुनाव कराए गए हैं। यदि गोपाल सुब्रमण्यम इन्हें ही मानक के बतौर व्याख्यायित करते हैं, तो अवश्य ही न्यायालय को इन पर पुनर्विचार करना चाहिए।
(लेखक जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं।)