19 April, 2016

आखिर किधर जा रहा है अपना समाज? ( प्रभात खबर से सम्बद्ध)

मुरारी कुमार मयंक।
रविवार को पूर्णिया जाने के क्रम में प्रभात खबर ख़रीदा जिसके सन्डे इशु ने तो हमे हिला के रख दिया।
जिसको अपलोगो के साथ भी शेयर कररहा हूँ।
जरूर पढ़े और अपनी राय देय।
शहरों में सबसे ज्यादा 20 वर्ष से कम उम्र के लड़कियॉ का
मां बनना शायद दुनिया की सबसे अद्भुत नैसर्गिक प्रक्रिया है, साथ में सबसे सुखद एहसास भी. जन्म देने का जिम्मा प्रकृति ने एक औरत को शायद इसीलिए दिया है, िक इस काम के लिए जो साहस और कोमलता चाहिए, वह सिर्फ औरत में ही हो सकती है. तमाम कष्टों के बावजूद एक औरत को सबसे ज्यादा खुशी मां बनने पर मिलती है. लेकिन, मां बनने की सही उम्र क्या हो?

जिस देश के कानून में लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष हो, वहां के शहरों में यदि गर्भपात करानेवाली महिलाओं में 20 साल से कम आयुवर्ग की लड़कियां ही सबसे अधिक (करीब 14 फीसदी) हों, तो यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि हमारा समाज किस दिशा में जा रहा है? क्या यह समाज में बढ़ते खुलेपन की निशानी है या पतन की ओर जाने का संकेत? क्या तकनीक और ज्ञान के मौजूदा युग में युवाओं में यौन शिक्षा और जागरूकता की जरूरत बढ़ गयी है? गर्भपात को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के हालिया आंकड़ों के बरक्स उठते अहम सवाल¢

भारत के शहरों में गर्भपात करानेवालों में सबसे अधिक प्रतिशत 20 वर्ष से कम आयुवर्ग की लड़कियों का है. यह चौंकानेवाला आंकड़ा नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) की पिछले दिनों जारी सर्वे रिपोर्ट में सामने आया है.

देश के ग्रामीण इलाकों में गर्भ धारण करनेवाली दो फीसदी महिलाएं विभिन्न कारणों से गर्भपात करा रही हैं, जबकि शहरी इलाकों में गर्भपात करानेवालों का प्रतिशत तीन है. लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि शहरी इलाकों में कुल गर्भपात में 20 वर्ष से कम आयुवर्ग की लड़कियों की हिस्सेदारी सबसे अधिक (करीब 14 प्रतिशत) है. सर्वे में कहा गया है कि शहरों में कम उम्र की लड़कियों के अधिक गर्भपात का एक कारण गर्भपात केंद्रों की सुलभता भी है.

‘भारत में स्वास्थ्य’ शीर्षक यह रिपोर्ट एनएसएसओ द्वारा जनवरी से जून, 2014 के दौरान  सर्वे में देश भर के 65,932 परिवारों (36,480 ग्रामीण एवं 2,952 शहरी) पर हुए सर्वे से प्राप्त सूचनाओं पर अाधारित है. सर्वे में 15 से 49 आयुवर्ग की 20 हजार से अधिक गर्भवती महिलाएं भी शामिल हुईं. सर्वे में एक यह तथ्य भी सामने आया कि छत्तीसगढ़ (44 फीसदी), बिहार (30 फीसदी), उत्तर प्रदेश (29 फीसदी) और झारखंड (26 फीसदी) जैसे पिछड़े राज्यों में आज भी बड़ी संख्या में शिशु जन्म अस्पतालों की बजाय घरों में ही हो रहा है.

जरूरी है यौन शिक्षा और सुरक्षित गर्भपात की योजना

जशोधरा दासगुप्ता
कन्वीनर, हेल्थ वॉच फोरम, उत्तर प्रदेश

साल 2008 के आसपास भारत के छह राज्यों- आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु- में एक अध्ययन किया गया, जिसमें 15 से 24 साल के करीब 50 हजार लड़के-लड़कियों को शामिल किया गया था. इनमें शादीशुदा और गैरशादीशुदा दोनों थे. इस अध्ययन में पाया गया कि देश में, चाहे ग्रामीण क्षेत्र हो या शहरी क्षेत्र, चाहे पढ़े-लिखे हों या अनपढ़ हों, हमारे युवा शादी से पहले यौन-संबंध बनाने लगे हैं.

अध्ययन में 42 प्रतिशत पुरुषों और 26 प्रतिशत महिलाओं ने शादी से पहले यौन संबंधों को स्वीकारा था. शादी से पहले संबंध बनानेवाले 85 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्हें किसी प्रकार की यौन-शिक्षा या गर्भ-निरोधक की जानकारियां या सूचनाएं नहीं मिली थीं. यही वजह है कि बहुतों ने असुरक्षित यौन-संबंधों को अंजाम दिया. यहां तक कि पहली बार के संबंध में भी लड़की गर्भधारण कर सकती है, इसकी भी जानकारी न तो ज्यादातर लड़कियों को थी, न ही लड़के को.

यानी बहुत ही बेसिक सूचनाएं हम अपनी युवा पीढ़ी को नहीं दे पा रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप अनजाने में गैरइरादतन गर्भधारण की प्रक्रिया चलती रहती है, जिसकी परिणति अंतत: गर्भपात के रूप में होती है. उपरोक्त अध्ययन के तथ्य और आंकड़े ग्रामीण और शहरी भारत के बीच फर्क को भी झुठलाते हैं. यह बड़ी विडंबना है कि सामाजिक परंपराओं और मूल्यों के चलते हम इन तथ्यों की अनदेखी कर रहे हैं. ऐसे में एनएसएसओ की हालिया रिपोर्ट में गर्भपात के अांकड़े चौंकानेवाले नहीं लगते, क्योंकि वर्षों से हमारा समाज इन तथ्यों की अनदेखी करता आ रहा है.

दवाओं की खुली बिक्री

उसी अध्ययन के मुताबिक, शादी से पहले यौन-संबंध रखनेवाली महिलाओं में से 18 प्रतिशत ने बताया था कि उसके साथ शादी से पहले जबरदस्ती संबंध बनाये गये थे. अमूमन प्यार-मोहब्बत में भी दबाव बनाये जाते हैं कि अब तो शादी करनी ही है, तो संबंध बना ही लेते हैं.
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